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वाणावर(बराबर)

वाणावर जिसे इतिहास में बराबर के नाम से भी जाना जाता है । प्राचीन मगध साम्राज्‍य के गौरवमयी विरासत का हीं एक प्रतीक स्‍वरूप है । यहाँ की गुफाऐं मूत्तियाँ एवं भित्ति चित्र प्राचीन वास्‍तुकला की अमूल्‍य निधि है । यहीं से गुफा निर्माण की वह अदभुत कला आरंभ हुई । जिस पर भारत वर्ष का इतिहास आज भी गौरवान्वित है ।

वाणावर पहाड़ी समूह में प्रमुख रूप से वाणावर एवं नागार्जुनी पहाड़ियाँ सम्मिलित है । वैसे तो इस पहाड़ी समूह में मूर्त्ति शिल्‍प, भित्ति चित्र एवं ललित कला के नायाब नमूने मिलते हैं, पर उस पहाड़ी समूह का सर्वप्रमुख आकर्षण यहाँ की गुफाऐं है । ग्रेनाइट की शैलों में आज से लगभग ढ़ाई हजार वर्ष पहले ये गुफाऐं बनाई गई थी । फिर भी इनका अलंकरण एवं उच्‍च कोटि की पॉलिश इनके बिल्‍कुल नवीन होने का एहसास दिलाते है । इन गुफाओं को भारतीय वास्‍तुकला की उन गरिमामयी परम्‍परा का प्रस्‍थान-बिन्‍दु माना जाता है, जिसका पल्‍लवित रूप से उदयगिरि, खंडगिरि, अजंता एवं एलोरा की गुफाओं में मिलता है ।

पुरातात्विक स्रोतों के आधार पर इस पहाड़ी समूह का काल 1500 ईसा पूर्व के करीब माना जाता है, पर ऐतिहासिक दृष्टि से इसका वर्णन तीसरी शताब्‍दी ईसा पूर्व से मिलने लगता है । प्रसिद्ध लोमष ऋषि गुफा में उत्‍कीर्ण एक अभिलेख में इस पहाड़ी को 'गोरठगिरि' कहा गया है, जिससे इसके महाभारत काल से भी संबंधित होने के संकेत मिलते है ।

वैसे तो वाणावर समूह की पहाडि़यों में काफी संख्‍या में शैलों को काटकर बनाई गई गुफाऐं विधमान है, पर जिन सात गुफाओं के कारण इसे विश्‍वव्‍यापी प्रसिद्धि मिली है, उनमें से चार वाणावार पहा‍ड़ी पर एवं तीन नागार्जुन पहाड़ी पर स्थित है । कर्णचौपड़, सुदामा, लोमष ऋषि तथा विश्‍व झोपड़ी गुफा वाणावर में एवं गोपी, वापी या वाह्यक तथा वेदांतिक गुफा नागार्जुनी पहाड़ी पर स्थित है ।

इन गुफाओं में उत्‍कीर्ण अभिलेखों से पता चलता है कि मौर्य शासक अशोक महान एवं उनके पोते दशरथ ने इन गुफाओं को अजीवक संप्रदाय के संतों को दान में दिया था ।

वाणावर पहाड़ी के उतुंग शिखर पर स्थित बाबा सिद्धेश्‍वर नाथ का मंदिर भी ऐतिहासिक है । ऐसा कहा जाता है कि महाभारत कालीन वाणासुर ने इसकी स्‍थापना की थी । वापी गुफा में अंकित एक अभिलेख से इस मंदिर के 7वीं-8वीं शताब्‍दी के होने का उल्‍लेख मिलता है । यहाँ आने वाले भक्‍तों की मनोकामना अवश्‍य सिद्ध होती है । सालों भर यहाँ श्रद्धालुओं का ताँता लगा रहता है ।

सिद्धेश्‍वर नाथ मंदिर के दक्षिण 'पाताल गंगा' नामक प्राकृतिक जलाशय है । भू-गर्भ से नि:सरित पवित्र जल से युक्‍त इस 'पाताल गंगा' के जल को लोग काफी पवित्र एवं औषधीय गुणों से युक्‍त मानते है ।

इसके अतिरिक्‍त इस पहाड़ी समूह में अनेक छोटी-बड़ी दर्शनीय गुफाऐं है। हथिया बोर, आनंद नौका बिहार जैसे रमणीक स्‍थलों के अलावे यह पहाड़ी अत्‍यंत दुर्लभ जड़ी-बूटियों का केन्‍द्र भी है ।

इतिहास के विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों के लिए यह स्‍थल शोध केन्‍द्र, पर्यटकों के लिए पर्यटन-स्‍थल एवं श्रद्धालुओं के लिए धार्मिक आस्‍था का केन्‍द्र है ।

जहानाबाद जिले का गौरव यह वाणावर 'सर्वधर्म समभाव' का भी प्रतीक है । यहाँ हिन्‍दू, मुस्लिम, बौद्ध एवं जैन धर्मों से जुड़े आस्‍था के केन्‍द्र हमारी प्रसिद्ध गंगा-जमुनी तहजीब की अद्भुत मिसाल पेश करते है।

वाणावर का सम्‍बद्ध किसी न किसी रूप से जिले में स्थित अन्‍य ऐतिहासिक स्‍थलों जैसे धराउत घेजन, दावथु, लाट, नेर, मीरा विगहा, बनवरिया एवं केउर जैसे स्‍थलों से भी रहा है । वाणावर महोत्‍सव के आयोजन से इन ऐतिहासिक स्‍थलों के विकास को भी एक नया आयाम मिलेगा ।